Friday, 2 May 2014

भीड़तंत्र और भीरुतंत्र

भीड़तंत्र और भीरुतंत्र जो मिल बैठे एक साथ
लोकतंत्र के कातिल करते लोकतंत्र की बात।

दामन पर इनके देखिये है कितने कितने दाग
प्रजातंत्र के मिथक को डसते इच्छाधारी नाग।

हर दिशा से आवाज़ है आयी, है चारो और ये शोर
लोकतंत्र की लाज़  बचाते हत्यारे, पाखंडी, चोर।

भ्रष्टाचारी इस प्रजा का ये भ्रष्टाचारी राजा
चोरों में हलचल मच गयी, खुला २-g का दरवाज़ा।

कोलगेट के घाट पर, कॉमनवेल्थ की अल्वाडी
अच्छे खासे देश की सेहत इन्होने बिगाड़ी।

अपनी अपनी बकते रहे, नहीं दिया सच्चे मन का साथ
गिनो चॉकलेट अब गुब्बारे, सब खतम हो गयी बात।

बुलेटप्रूफ जैकेट से ढकते, ये 53 इंच का सीना
कहीं अखाड़े लड़ मरो, अभी देश को और दिनों है जीना।

छुरीबाज़ फिर दंगाई अब विकासपुरूष हैं आप
जनमानस की तुच्छ मति में दफ़न हो गए पाप।

लोकतंत्र पर बाँध बनाते, अनशन देखो ये करबाते, बजाते सबके बारह
सारी दुनिया पीतल कि मैं स्वर्णिम बेबीडॉल, बन गया इनका नारा।

साधू जैसे वेश में देखो, नेताओं के बाप
भगवा मैला मत करो, सूट सलवार पहन लो आप।

जनता शायद भूल गयी, हम लोकतंत्र के पांव
पहले खुद को तौल ले, फिर नेताओं पे दांव।

मारा-मारी, छल कपट, दिनोंदिन बढ़ता जाता
आबादी की बात करो, जो है इन सबकी माता।

सीढ़ी चढ़िए एक एक, वरना गिरिएगा औंधा
मिट्टी, पानी और समय, बीज तब बने है पौधा।

दोष लगाना छोड़िये, वेवकूफों को दें आराम
स्वतंत्रता, अधिकार जानिए, कीजिये रचनात्मक कोई काम।

बैर, बुराई, अहम समझिए, भीड़ छोड़िये आप ही बढ़िए
समस्या का मूल समझिए, देश छोड़िये ब्रह्मांड को गढ़िये।

Monday, 2 January 2012

प्रेम और विस्तार

आज फिर अनकहे को कहने की कोशिश करता हूँ 
हवा में एक तस्वीर बनाई है अब रंग  भरता हूँ 

दुनियां की लिखा पढ़ी का  सार नहीं दिखता
सच है बंद आँखों को  विस्तार नहीं दिखता 

खुद को देख पाने का  अच्छा अवसर पाया है 
हिम्मत कर परिंदा  फिर गगन को आया है 

बंधनों की परिभाषाओं के  सारे बंध तोड़ने है  
प्रेम की नज़र से इस जहां के राज खोजने है





Monday, 12 September 2011

साँस लेता है कोई



   खुद की ही गहराइयों में साँस लेता है कोई,
   ख़ुशी में घुली उदासी , जान लेता है कोई.
   अँधेरे और उजाले में, छिड़ा है पुरजोर द्वंद्व,
   फिर कौन  देखता है, दोनों को एक संग .




Saturday, 9 April 2011

"शब्द और सत्य"

                                 शब्दों का यदि कहें ,आखिर सत्य क्या है 
                                 यदि शब्द ही सत्य हैं तो प्रक्रति प्रदत्त क्या है 

                                 माना की शब्दों ने जीवन को कई नए आयाम दिए हैं 
                                 एक साथ मिलकर शब्दों ने रचनात्मक निर्माण भी किये है 

                                 सच है शब्द खुद को फैलाने का आसान सहारा हैं  
                                 कभी गुस्सैल  हैं ,कभी प्रेमी हैं तो कभी आवारा हैं 

                                समझ पता हूँ इनकी ताकत तभी तो डरता हूँ 
                                वेबस हूँ ,कुछ कहने को इन्ही  का प्रयोग करता हूँ 

                                मन की अभिव्यक्ति वेशक, शब्द की डाली पर फलती है  
                                हुआ करते थे कभी सहारा,अब दुनिया शब्दों पर चलती है

                                शब्दों के हैं सौदागर यहाँ ,शब्दों के दीवाने हैं
                                नापना चाहो किसी को अगर शब्द ही पैमाने हैं

                                शब्दों से दुखित होते हैं, हम खुशियाँ इन्ही से पाते हैं
                                अंतर्मन के सभी फसाने इन्ही से महसूस किये जाते हैं

                                शब्दों के इस जगत में कुछेक को आसानी भी है
                                कुछ बेचारे यूँही वेबस है ,बरबस ही परेशानी भी है

                                कहीं कहीं शब्दों का लक्ष्य वार्तालाप है,और कुछ भी नहीं 
                                भरमाने वाले इस जगत में अक्सर ऐसा होता तो नहीं 

                               प्रतिशत वहुत कम है, मगर "मौन" भी जीवित है कहीं 
                               हरेक को शब्द पर तौलने की कोशिश करना भी नहीं 

                               शब्दों से बाँधकर तुमने जाने कितने अनुमान गढ़े होंगे
                               हो सकता है कुछेक तौल पर ठीक-ठाक भी चढ़े होंगे

                               हर एक गहराई को फिर भी एक मत समझ बैठना
                               कभी कभी निगाहों से भी मुश्किल होता है देखना

                              अनुमानों कि विनाह पर कुछ कम ही अकड़ना
                              जीवन इतना तरल है, की आसाँ नहीं है पकड़ना

                              वैसे तो दुनियाँ सरल है, शब्दों ने जटिल किया है
                              सीधा सा भी अगर सच है उसको भी घुमा दिया है

                              कुसूर नहीं ये तुम्हारा, सब ज़माने कि गलती है 
                              हुआ करते थे सहारा, अब दुनियाँ शब्दों पर चलती है 

                              कभी कभी अस्तित्व पर इतना प्यार होता है
                              करैं कुछ भी, कहें कुछ भी, सब बेकार होता है

                              माफ़ करैं हमें,यदि आपके दिल,हमारे शब्दों में ठनी है
                              कोशिश करना दूर हो सके,यदि कहीं ग़लतफ़हमी बनी है 

                              शब्दों के प्रभाव को देखकर, अब खुद को सिकोड़ना चाहूँगा
                              पानी हूँ,बहना तो नहीं छोड़ सकता,हाँ रूख़ जरुर मोड़ना चाहूँगा    

Wednesday, 2 February 2011

समानता पर चाहिए

ठगे से पैरों में हलचल दिखाई पड़ती है 
बदलते दौर कि आहट सुनाई पड़ती है .
  
खुश हूँ , कि कली पर रुबाब आया है 
जमे हुए पानी पर फिर वहाब आया है .

लौट आई है ,चमेली पर भूली सी महक 
याद आई है , बुलबुल को वही प्यारी चहक .

खुश हूँ , खुशियों के सही मायने के लिए 
खुद को दिखा सके , उसी आईने के लिए .

चिंगारी और भी भड़के यही फर्माहिश है 
सारा जंगल ये जला दे , यही ख्वाहिश है .

सब कुछ देखता हूँ , फिर भी ये ख्याल आता है 
जुवां पे फिर भी, बरबस ये  सवाल आता है 

ख़ुशी की कलम में कहीं दुख कि स्याही तो नहीं 
ख़ामोशी ये ,कहीं किसी तूफ़ान की गवाही तो नहीं .

बड़ चला जो कारवां , कहीं रुक तो न जायेगा 
उन्मुक्त परिंदा ,कहीं पिंजरे में तो न आएगा .

समय अभी वहुत है , अंजाम कई है बाकी
जाम तो छलकता है , पर आधा ही है साकी .

समय की आढ़ में बहुतेरे ख्वाब भी बुनते है 
कली को नहीं , तोड़ने सब फूल ही चुनते है .

जो दिखाई दे हो सकता है; हो ही न कहीं 
सम्भावना तो उसकी भी है , जो दिखता ही नहीं 

नहीं ;घबराना नहीं , आग में कूद जाना है 
मरना तो कभी है नहीं, नया जीवन पाना है .

सवाल तेरा ही नहीं , सारे उपवन का भी है  
ड़ाल , पत्ते , कलियाँ और सावन का भी है.

अस्तित्व एक है सबका , और कहाँ जाइये 
भेद तो बहुत सुन्दर है , समानता पर चाहिए .




Sunday, 14 November 2010

कहना सुनना या जानना नहीं, जी लेना है इसे

गम कहूँ या हँसी ,लगता है कि झोंका है
कहता हूँ तो तन्हाई, देखता हूँ तो मौका है.

कहता है वफ़ा जिसको,लगता है कि धोखा है 
तू है कहाँ खुद का ,फिर किसका भरोसा है.

माना जिसे हकीकत,वस शब्दों का घेरा है 
अँधेरा है कहा जिसको, नामौजूद सबेरा है

जी रहा है जिसको, जो जीवन सा दिखता है 
सोचा है वो किसी का,जो बाज़ार में बिकता है.

पल पल है सँवारा, जिसे सभाल कर रखता है
 ये जो रेत का घरोंदा,बनता है; के मिटता है.

माना इसे तो चाँदी,माना तो ये सोना है
ये उधार कि आँखे,और खुद में ही रोना है .

उड़ सके जो फलक तक,पिंजरे में वो मैना है
कुछ डरे डरे से पर है , और सूखे से नैना है.

इस हाथ कि खुशी जो, उस हाथ का ही गम है    
है कलम तक लिखावट , और आँख तो दर्शन है .
 

Wednesday, 15 September 2010

ख़ुदा-ए-जहान का भी अजीब किस्सा है

  ख़ुदा-ए-जहान का भी अजीब किस्सा है .
  क़त्ल हो रहा है जो, कातिल का ही हिस्सा है .

  बंद है आँखें उसकी और ध्यान गाफ़िल है.
  जो मिल रहा उसे वो नाम क़ातिल है.

  मरने वाले  को बेशक़, मौत कि न समझ आई है.
  क़ातिल के है जो सामने खुद उसकी ही सच्चाई है.

 क़त्ल और क़ातिल एक ही जहां कि बातें है 
 जो समझ सके वो समझ ले, एक ही सी साँसे हैं .

इंसानियत कि खाल में नकाबपोश मौन हैं.
न मरने वाला, न मारने वाला ये कुसूरवार कौन है.


Sunday, 1 August 2010

रूहें घरों में बंद पड़ी है देखो. ........

रूहें घरों में बंद पड़ी है देखो. 
राहों में तो मशीने नजर आती है 

समय गुजारना स्वभाव बन गया है 
रूहें खुद को कहाँ समझने  पातीं है 

इंसान कि आखों का पानी जम गया है 
परायी सिसकियों कि कब याद आती है 

अपनत्व कि आढ़ में व्यापार पनपते हैं .
अपनेपन कि परिभाषा कहाँ समझ आती है .

पग पग पर भविष्यवाणियों  का बाज़ार लगा है.
सब कुछ जानते भी दुनियां खुद को भरमाती है 

रंगों का क्या ये तो जगह जगह मिलते है 
फिर भी ये दुनियां श्वेत श्याम नजर आती है 

जब  कभी ये पलके वोझिल महसूस करती है .
अचानक ही अश्कों कि  स्याही बन जाती है .

Saturday, 12 June 2010

के प्याला जिंदगी का......

                              मत तौल के ये जिंदगी  बोझ नहीं है.
मत सोच के ये जिंदगी सोच नहीं है.
जी गया है ,जिसने खुद को पा लिया है 
      के  प्याला जिंदगी का मजे से पिया है......

बैसे तो दुनिया का कोई छोर नहीं है.
चला जा कहीं भी, तू कोई और नहीं है 
वाह रे भगवन ये तूने कैसा वर दिया है. 
दूसरों की सोच ने, अपंग कर दिया है.

तू ही है आसमां ,धरा भी तू ही  है.
दुनियां की नेमतों से भरा भी तू ही है .
अर्थ की तलब  ने, अनर्थ कर दिया है.
सुखों की तलाश ने, दुखों से भर दिया है 

जीवन जीने की, परिभाषाएं नहीं होती.
इस बात को समझने भाषाएँ नहीं होती.
समझने की चाह में, विवेक खो दिया  है .
युगों-युगों से कटुता का बीज बो दिया है .

न समझ इसे संघर्ष,ये कुस्ती नहीं है 
जीतने की प्यास कभी बुझती नहीं है.
बैर ने हसी से कितना दूर कर  दिया है.
प्याला इस जिंदगी का चूर कर दिया है .

निर्झर इस नदी को वेरोक बहने दो.
इसकी ये कहानी , इसी को कहने दो .
जीवन वही जो खुद की शर्तों पे जिया  हो.
के प्याला  जिंदगी का मजे से पिया हो......

Friday, 4 June 2010

शायद कहीं ऐसी भी दुनिया होगी

शायद कहीं ऐसी भी दुनिया रही  हो 
की मीरा बेरोक नृत्य करती रही हो .

ह्रदय  में उमड़ा हुआ अंतहीन सावन होता हो 
कलियाँ खिलती रहें फूलों पर ताउम्र योवन हो. 

पर्वत का पत्थर व्रक्षों का वोझ सहता हो 
वेखोफ़ जहाँ जीवन एक साथ रहता हो .

घोसलों में  जहाँ  उन्मुक्त सवेरा सांस लेता हो 
और भोर से थक कर अँधेरा निश्चिंत सोता हो. 

जहाँ प्रेम का फरमान हवायें गुनगुनाती हों
हर राह से होकर नदियाँ फिर मिल जाती हों .

अस्तित्व का विस्तार दिशायें रोक न पाती हों 
समय सीमायें तोड़कर सदियाँ खुद खो जाती हों. 

जहाँ दिल खोल कर दीवाना भीग सकता हों 
जहाँ उन्मुक्त हों नवजात जीना सीख सकता हों. 

जहाँ माया का रूपरंग ,मायना समझ न आता हों 
जीवन का मतलब है बस्तु समझा न जाता हों. 


Friday, 19 March 2010

क्षितिज ने पहली बार चादर हटाई है

दिल में अजीब सी उलझन है
पर लगता यूँ है ,कुछ उम्मीद नजर आई है.

सब कुछ भुला देने को मन करता है,
तो ऐसी कौन सी बात याद आई है.

नजरों के सामने भीड़ दिखाई पड़ती है,
पर अन्दर तो दिखती तन्हाई है.

अँधेरा भी है और सन्नाटा भी,
पर देखा तो लगा, कोयल गाई है.

मौसम थमा सा और खुला सा दिखाई देता है,
फिर कहाँ से बिजली कि चमक आई है.

तन में थकन और आँखों में नीद है,
पर होंटों पर जागृत सी मुस्कान उभर आई है.

दिमाग ने मान ही लिया था इसे उदासी,
पर दिल ने कहा खुशी की झलक पाई है.

धरातल भी दिखाई पड़ता है, और आसमां भी,
क्षितिज ने पहली बार चादर हटाई है..........

Tuesday, 9 March 2010

जीवन...... या जानी-समझी बेहोशी .

   हृदय में अजीब सी  खिन्नता नजर आती है,ऐसा नहीं है कि आसपास व्यस्तता का अभाव हो ,बात तो यही है ये व्यस्तता आखिर चाह क्या रही है. शांत भाव से यदि अवलोकन किया जाये तो हम पते है , कि कोई कथनी में मगन है तो कई करनी में ......... लक्ष्यों कि भरमार है, जिन पर लक्ष्यों का अभाव है उन पर तो और ज्यादा व्यस्तता मुह बाये खड़ी है.
       
     पर ये सब हो क्या रहा है ,और ये सब क्यों हो रहा है मकसद सबके एक ही समान है जैसे -किसी को अपना सर ऊँचा करना है तो किसी के माँ बाप के अरमान अधर में लटक रहे है, किसी की जेब  है कि भरने का नाम ही नहीं लेती, किसी को आये दिन समस्या खड़े रहती है आदि - आदि .
   
   बचपन से अब तक कई परिवर्तन देखने को मिले ,लेकिन सिवाय देखने के कुछ समझ नहीं आया कि ये परिवर्तन आखिर हुए क्यों. वैसे दुनियादारी कि भाषा में तो कई तर्क दिए जा सकते है, क्योंकि यहाँ पर आसन शब्दों द्वारा कठिन से कठिन कहे जाने बाले सरल से सरल सवालों के जटिल से जटिल जबाब बना लिए गए है.
     
    दुनिया विकास कर रही है और विकास की ही बात की जा रही है, पर ये विकास कैसा है बही ऊँची-ऊँची इमारतें,बही उच्च छमता बाले राजमार्ग , जिन्हें देखकर खुद के छोटेपन को बड़ा किया जा सके . सब कुछ हमारे ही आनुरूप.  

    पेट  का पानी हिलना सेहत के लिए हानिकारक हो सकता है , ये तो अब एक विचार का रूप बन गया है, शरीर  को   आराम देना जरुरत के साथ साथ मापन पद्धति भी बनकर उभरी है. क्योंकि ज्यादा शान-शोलत ज्यादा आराम-दायक वस्तुओं कि वहुलता प्रभुत्त्व निर्माण कि ईंटें  है. 

     एक दिशा और भी है , जहां भौतिकवाद  और कर्मकांडवाद को मिला कर या विकास और पुरानेपन का घोल बना कर चेहरे पोतने का सतत प्रयास जारी है, ये सदियों से चली आई परम्परा आखिर करती क्या आई है , वही सामूहिक और राजनैतिक तलों पर अंधाधुन्द पनपते भौतिकवाद  को अपना आशीर्वाद देती चली आई है. कही गयी बातों को को सिद्दान्त कहा गया फिर उन्हें अपने अनुरूप तोड़ मोड़ कर नए नए प्रकार के आडम्बरों को जन्म दिया गया . 

   बोरियत के पलों में खाली वैठे हो तो इस कर्मकांडी शांति का सहारा  लेकर पराकास्ठा के अभिमान को नहलाया जाता है ,और भविष्य में ज्यादा सुख - समृधि , रूपया पैसा ,सम्पदा कि गारंटी दी जाती है.
   
   भौतिकवाद को नजर न लग जाये इसलिए जरुरी है कि सभी मिलकर रहें पर स्थानीय स्तर तक , और फिर स्वरक्षा कहकर अपने अन्दर छुपी हिंसा को निकालना  तो भार्मिक कृत्य है.

  इन सभी क्रिया- कलापों में व्यक्ति तो अपने आप को बनाये रखने के लिए जरुरी उर्जा  प्राप्त कर लेता है ,पर मुसीबत तो है गवार. अनपद , नासमझ पशु-पक्षियों की ,पेड़- पौधों की . आखिर ये सब प्रकृति प्रदत्त  संसाधन ही तो है, जो मनुष्य के लिए उपयोगी वस्तुओं से ज्यादा और कुछ नहीं...और हो भी कैसे सकते है जब इंसान को अपने सामने खड़ा इंसान मशीन से ज्यादा और कुछ नहीं रहा, तो इन संसाधनों की क्या कीमत .
   
  शायद हम ये भूल रहे है , की हमारी वनाई हुई दुनिया हमें आराम तो दे सकती है पर ख़ुशी नहीं ,और कहीं न कहीं प्रक्रति से जोड़ने बाले तार ही हमारे बेचैन दिल में झंकार उठा सकते है . क्योंकि ये भूली हुई चेतना भी उसी प्रक्रति का अंग है .

Friday, 19 February 2010

अच्छा लगे बड़ा ही ,कुदरत का ये वर्ताव

अच्छा लगे बड़ा ही , कुदरत का ये  वर्ताव.

चढ़ने को है सूरज ,बढ चली है नाव.

वृक्षों की पत्तियों पर ,ओस का ये छिडकाव.

अकड़ी सी टहनियों में , यूँ बला का घुमाव.

नटखट सी नदी का , अलबेला सा ठहराव.

महकी सी हवा का , शर्मीला सा बहाव .

चहकते से पंछियों का ,तट पर ये जमाव .

गुनगुनाते से दिल में ,उमड़ते ये भाव .

अच्छा लगे बड़ा ही ,कुदरत का ये वर्ताव .

Thursday, 22 October 2009

बस हम इंसान ही तो हैं ............

कभी तो सोच मानव ,क्यों लिया धरती पे तूने ये जनम ,
कभी तो याद करले ,प्रेम करना है तेरा पहला कदम ।


कभी तो देख चलके बेधड़क सच्चाई के उस रस्ते ,
कभी तो देख बनके तू बना इंसान जिसके बास्तें ।


क्यों भर रहा है दम, जो तू चल पढ़ा गँवांने को ,
होता रहा है दूर जिसको आया था तू पाने को ।


क्या कर सका है ,न्याय जिसे अपने लिए है मांगता,
क्या देखे रुक के फूल, चला आया है जिनको लांघता


क्या यही है तेरी खोज ,ये सरहद , ये रक्तरंजित सरजमीं
या समझ लिया है बोझ ,चैन की तलाश थी तुझको कही।


बन तो गया दरबान , मौत का कर सकेगा सामना ,
क्या मरते को जीवन दे सकी,पुरुषत्व की अवधारणा ।


क्या है तुझे ये इल्म , तेरे झूठ ने तुझको ही झूठा कर दिया,
जीतने की चाह ने छोटे कद के इस जहां को और छोटा कर दिया।


क्या हो गया हासिल ,जो सुन ली पत्थरों की दास्तान ,
न हिन्दू आया, न मुस्लिम पैदा हुआ, ये मेरी बात मान ।


अहसास करके देख ले ,कभी औरों के भी दर्द को ,
ऐसा न हो मर जाये व्यर्थ , न समझे जिंदगी के अर्थ को।


तू देख करके गौर, एक ही माटी के पुतले है सभी,
धर्मान्धता हटा, इंसान बनने की कोशिश कर कभी .

Tuesday, 13 October 2009

दिवाली या सिर्फ सजी हुई इमारतें .....

अध्यात्मिकता का सम्बन्ध स्वतंत्रता से है और जब व्यक्ति पूर्ण रूप से स्वतंत्र होता है तो उसे खुश होने के लिए त्यौहार की जरुररत नहीं होती,हमारे देश में व्यक्तिगत जीवन को सामाजिक दायरे में इस तरह से बाँधा गया है ,की वह परतंत्रता को ही अपना जीवन लक्ष्य समझता रहे. और इस सामाजिक जीवन में थोड़े सा मनोरंजन लाने के लिए त्योहारों को स्थान दिया गया है तो क्या हम त्योहारों के माद्यम से वाकई ख़ुशी महसूस करते है या सिर्फ ये आ रहे ढर्रे का अंश मात्र है

खुशहाली आज फिर से भरमाने को है ,
दिवाली आज फिर से आने को है।
दिलों में रक्खा क्या ,दीवारें साफ़ है ,
फिर क्या नजर दौडायिए,आप ही आप है.
धन की ये सालगिरह मानाने को है,
दिवाली फिर से आने को है।
मोह्हले के बच्चे की पत्तल अधूरी है,
थाली का क्या हो, भोग लगाना पहले जरुरी है.
शुभकामनाओं का बाजार गरमाने को है
दिवाली आज फिर से आने को है।
ज्योत का ज्योत से संगम दिखाया जायेगा,
इस बहाने रूखापन जिंदगी का छिपाया जायेगा.
अर्थ आज फिर से देवत्व पाने को है,
दिवाली आज फिर से आने को है।

कबीलों में कुछ समय फिर से मस्ती छाई है,
नफरत पसंदी इन दिलों को जिन्दादिली याद आई है
दुखित मन दिल खोल अपनापन दिखाने को है.
दिवाली आज फिर से आने को है।
दीपक क्या रात का कालापन दूर कर पायेगा,
धमाका क्या दिलों का सन्नाटा हटाने पायेगा.
सोये हुए दिलों में उत्साह समाने को है,
दिवाली आज फिर से आने को है।

सच को क्या किसी मौके की कवायत होती है,
हर दिन जीवन का सावन,हर रात दिवाली होती है
हर रोज की तरह एक आवाज उठाने को है
दिवाली है ,क्या रोज मनाने को है ।

Sunday, 27 September 2009

प्रेम हो जाये, तो इन्सान तर जाये


इंसानियत फकत है क्या, इस जिंदगी का मकसद
हस्ती अपनी ही मिटाकर ,इंसा एक बनाना है ।
रुक गया था वेबजह ही , चलते तुझे जाना है ।

अकेला है दिले-इंसा,अकेला ही खुदा है
अकेला ही आया था ,अकेला तुझे जाना है.
रुक गया था बेबजह ........................

ऊँची इन लहरों को, बेकार दी तब्बजो.
डूबना ही तो पाना है, बस डूबते जाना है
रुक गया था बेबजह ...................................

खो तू नहीं गया था , ये जमाना खो गया है
हरेक को भुलाकर , अपना सबको बनाना है .
रुक गया था बेबजह .................................

ऐतबार हो गर खुद पे ,क्यों और पे भरोसा.
अँधेरे को समझ ले, जहाँ रोशन जो कराना है
रुक गया था बेबजह ..............................................

समझ गया हूँ अब इस, जूनून-ऐ-इश्क को मैं .
तू दूरियां बना ले, तुझे पास ही आना है .
रुक गया था बेबजह ......................................

इतनी नहीं है राहें ,दिखा दी गयी जो तुझको.
बस एक ही है रास्ता,जिस पर हमें जाना है .
रुक गया था बेबजह ........................................

लपटों का डर है कैसा, जब आग है तू खुद ही
जल जाने दे घरोंदा, बस रूह बचाना है .
रुक गया था बेबजह ........................................

इश्क है ये पगले, मत दे इसे इबारत.
ये अंश है खुदा का, जो तू अब भी दीवाना है
रुक गया था बेबजह .....................................
ये कुछ जबाब उन पंक्तियों के है जो पिछली पोस्ट मैं सवालों के रूप में सामने आये थे वास्तव में यदि मानव अपने पराये में भेद करना भूल जाये तो उसे प्यार की सही कीमत मालूम पढ़ जाये,फिर उसे जिंदगी जीना नहीं पड़ेगी,बल्कि जिन्दगी उसे खुद जीने को प्रेरित करेगी

Tuesday, 22 September 2009

क्या कहा .... प्रेम हो गया?


बनने लगा था इन्सां,पर अब रहा नहीं
गर यूंही था मिटाना ,तो फिर बनाया क्यों था

खोता चला गया हूँ ,ज़माने की भीड़ में तो
गर छोडनी थी ऊँगली तो अपना बनाया क्यों था

बढ़ने की मैं अकेले ,कर ही रहा था कोशिश
सहारा यूंही था छुडाना,तो साथ आया क्यों था

भरोषा किया था इतना, की आँखे नहीं रही ये
गर चराग था बुझाना ,थो फिर जलाया क्यों था

बनने लगी है अब राहें खुद अपनी तर्ज पर ही
रास्ता यूंही था भुलाना, तो फिर दिखाया क्यों था

समझा नहीं हूँ अब तक, जुनुने-ए-इश्क को मैं
गर दूर ही था जाना ,तो पास आया क्यों था

जवां हो चली ये लपटें,चिंगारी से अब तलक तो
आशियाँ यूंही था जलाना, तो फिर सजाया क्यों था

समझा नहीं मैं मकसद ,अब तक भी इश्क के ये
गर होश में था आना,तो फिर दीवाना क्यों था

जीवन के कई पड़ाव है ,कई रंग है. हर एक को समझना, और उन्हें जीना ही हमारा मकसद है, अगर आप चाहते है की जीवन को जी सकें, तो जरुरी है आप के पास प्रेम का सहारा होना चाहिए ,अन्यथा जीवन काटने से ज्यादा कुछ नहीं.
वैसे तो प्रेम एक ही संवेदना है ,पर अनुभव न कर पाने की बजह से खासकर भारत जैसे देश में इसके इतने प्रकार बताये जाते है की गिन पाना मुश्किल है . मगर जब कोई एक खास पड़ाव पर आता है तो वह इस दोराहे पर भ्रमित हो जाता है की जन्मजात संवेदना जिसे प्यार कहते है क्या संबधों के दायरे से बाहर नहीं हो सकती ,क्या कोई और जो उसका कोई नहीं लगता उससे भी प्यार हो सकता है, अब चूँकि प्रेम तो हो ही जाता है ,तो व्यक्ति बड़ी आपाधापी में फंस जाता है क्या करुँ या क्या ना करुँ, और फिर वो समाज के एकतरफा व्यबहार के चलते अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि 'प्रेम' को अपनी गलती समझकर बैठ जाता है.
फिर क्या कई सबाल उठ खड़े होते है, जो की कविता के माध्यम से बताने का प्रयास किया है, हलाँकि अगर खोज को जरी रखा जाये तो जबाब भी मिल जाते है,जो अब अगली पोस्ट का विषय होंगे ।

Wednesday, 16 September 2009

जीवन जीना है तो शराब-ऐ-हँसी पीना है

आज जब हम बहुत व्यस्त है ,तो रोजाना की दौड़-धूप में जीवन को जीना ही भूल जाते है. चेहरों की हंसी अजनबी हो जाती है तो इसी रोज की दौड़-धूप से ही कुछ हंसी के पलों को चुराने की कोशिश है,कुछ इस तरह --

एक बस पकड़ रहा है,और एक सर क्योकि स्कूटर पंचर हो गया है और अब दफ्तर जाने में देर हो रही है; रिक्शे का पहिया टेढा हो गया है,बच्चे ज्यदा भर ,लिए अब उन्हें स्कूल जाने में देर हो रही है

यहाँ मैडम के बाल धुल रहे है उधर महाशय भूखे मर रहे है, महाशय को कोर्ट जाना है और मैडम को बुटीक दोनों को देर हो रही है , एक महिला देखो नोट झटक रही है तो दूसरी की नौकरी अधर में लटक रही है,जल्दी करो भाई कहीं देर न हो जाये

भाई साहब रात भर से जग रहे है,एक बेचारे बेवजह ही भग रहे है;अब क्या करें गार्ड की नौकरी और नाईट शिफ्ट ;दूसरे की ट्रेन छूट रही है मगर बाथरूम का पाइप चोक हो गया है तो कम से कम कमरे के चक्कर तो लगाये ही जा सकते है

एक का पेंट जाली हो गया तो दूसरे का खोपडा खाली हो गया ,बहुत दिनों से कपडे बनबाने का ध्यान ही नहीं रहा पीछे से पेंट छन गया,दूसरे की सुबह सुबह पोहेबाले से बहस हो गयी ,अरे अगर पैसे ले रहा है तो कम से कम प्याज़ तो डाल दिया कर

घर में जाले लटक रहे है,भैया जी चड्डे में मटक रहे है ओफ्फो यह बैंक एक्जीक्यूटिव की नौकरी सुबह से मुह मत धो ,भाई साहब को फ़ोन आ गया पहले प्लान समझाना पड़ेगा

बच्चो को स्कूल की भड-भडी है ,मैडम को पेट की पड़ी है ,सर्दी का ये समय आँखे खुली नहीं ठीक से और स्कूल-बस हार्न दे रही है ,वहां मैडम को बदहजमी हो गयी और तो और हेड-ऑफिस में कोई और घुसा है अब ये देर तो कीमती साबित हो सकती है

बस बाले का पट्रोल जल रहा है ड्राईवर खेनी मल रहा है भाई साहब के बच्चे पता नही क्या पट्रोल के दाम आसमान छु रहे है अबे खेनी तो कभी भी ठूंस सकता है

यहाँ मरने-मारने की सम्भावना बढ़ी है तुझे पीने की पड़ी है ,आपस में ठेकेदार लड़ रहे है की दारू कोंन बेचेगा,और नौजवान बिना पिए रह नहीं सकता "अरे पहले बाटली तो दे दो फिर लड़ लेना "

एक की जेब खाली हो गयी ,दूसरे की देखते ही हालत माली हो गयी ,अरे गुरु अब तो पैसा दे दो तीन साल हो गए आज तो जेब में इतना भी नहीं की सिगरेट पी लूं ,जबाब में " अरे भैया यहाँ तो जहर खाने के भी पैसे नहीं है " तीन साल से बस हवा खाके ही तो जिन्दा था वेचारा

इधर बिना धुले कपडे लटक गए वहां साहब रास्ता भटक गए , मैडम का सहेलियों में गप्पें हांकने का समय हो गया था तो बस कपडे खगाल-खगाल कर लटका दिए सूखने के लिए,वहां साहब को सब्र न था की ट्रेन कब तक जायगी कब फाटक खुलेंगे तो साहब पटरी पकडे-पकडे जाने कहाँ निकल गए सोचा था कहीं से कट लेंगे और जल्दी से जल्दी दुकान खोल लेंगे

पुलिस ने निर्दोष को धर दबोंचा ,मंत्री भिखारी के घर पहुंचा, अगर तीन दिनों के अंदर -अंदर लुटेरों का पता नहीं लगता तो पुलिस की नौकरी जा सकती है,चलो एक निर्दोष को ही बंद कर दिया ,कुछ नहीं से तो कुछ भला ;उधर आज मत्री साहब वोट मांगते-मांगते भिखारी के घर भी जा पहुंचे ,अब जरा आप ही बताइए भिखारी कौन.

Thursday, 10 September 2009

वो बोलता था सच

अब तक बुद्ध के बारे मे जो कुछ भी जाना है, यों समझिये राइ से ज्यादा कुछ भी नहीं पर जितना जाना है,उससे अनुमान तो लगाया ही जा सकता है की वह क्या ब्यक्तित्व होगा जिसने एक समय के बहाव को पूरी तरह से उलट के रख दिया हो; क्या जादू होगा उसकी वाणी मे जिसने उस समय, जब मानवता को तलबार से तौला जाता था करुणा,दया के मंत्रों से दुनिया को बाँध दिया था और बिना किसी अमृतपान के ही अमर हो गया था

आज फिर जब हम बुद्ध के उपदेशों को समसामयिक समाज से तौलते है तो यह समाज बौना नजर आता है

यह बात गौर करने की है की अगर जीवन को बचा कर रखना है तो फिर एक बुद्ध का होना जरुरी है ,अन्यथा यह दुनिया गूंगी और बहरी होकर हिंसा की आग मे जलने तैयार हो चुकी है

बुद्ध को याद करते हुए कुछ पंक्तियाँ बन बैठी थी,जो सुनाने जा रहा हूँ

वो बोलता था सच, क्या कुछ न मिल गया होगा
पानी का था बुलबुला ,पानी मे घुल गया होगा
दुनिया तो बढ़ चली थी, दुनिया को ख़त्म करने
जीवन की उस सुई से, जीवन को सिल गया होगा
क्या कुछ न मिल गया होगा

भावनाओं की नदी के , सूखे हुआ किनारे
सूखे पड़े थे चक्षु, सूखे थे होंठ सारे
आँखों की दी नमी और होंठों को फिर सहारे
सद्भावना का दीपक, करुणा से जल गया होगा
क्या कुछ न मिल गया होगा
साँसे तो चल रही थी, पर था कहाँ पे जीवन
गा तो सभी रहे थे ,पर थी कहाँ वो सरगम
बिगुल की लय क्षमा से, दया का राग गया
आजाद सा परिंदा , पिंज़रे से उड़ गया होगा
क्या कुछ न मिल गया होगा
धर्मों मे जल रही थी, जीवन की दिव्यता भी
लम्हों मे बिक रही थी,निस्वार्थ आत्मीयता भी
आते ही उसके जैसे ,उमडा हो जैसे यौवन
संवेदना का युवा पुष्प, महाबोधि पे खिल गया होगा
क्या कुछ न मिल गया होगा

Friday, 14 August 2009

श्याम से कहो - पैसा कमाए

श्याम से कहो - पैसा कमाए मुरली तो बाद मे भी बजायी जा सकती है
प्रातः काल का समय, नीला आकाश और कही दूर नदी किनारे के पास से आती हुई सुरीली बांसुरी की लय ,इस बासुरी की लय पर तो मानो सब की सब प्रकृति नाच उठी हो ,फिर इस मानब हृरदय मे तो झंकार बज ही उठेगी ,इस बासुरी की तान पर तो राधा सुध-बुध खो देती है और गोपीयों को जीवन जीने की उर्जा मिल जाती है ; पूरा बाताबरण जैसे आनंदित हो गया हो जिस प्रकार जीवन तथा उसे जीने बालों मे ताल-मेल बन गया हो
पर २१वि सदी मैं तो ये सब बे सरपैर की बातें है क्योंकि अब तो बासुरी का अस्तित्व संकट मैं है, श्याम का मन उब गया है और राधा को भी ये सब कहाँ सुहाता है श्याम को उनके पिता ने अर्थ की अनंत भूख का शिकार बना दिया और राधा अब किसी महेंगे चार पहिया बाहन को महत्व देने लगी है प्रेम तो इस सदी मे कहाबत से ज्यादा कुछ रहा नही , हर जगह जरूरतें मुहबाये खड़ी है सदी मे प्रेम के अनेक प्रकार है और समय भी सुनिश्चित केर दिया गया है, और तो और सभी ने श्याम और राधा को इस बार वन्धन मे वान्धने का निर्णय भी केर लिया है ताकि अब कही श्याम और राधा को मिलने यमुना किनारे न जाना पड़े
राधा ने भी ये प्रण करलिया है की राधा अब श्याम की तभी होगी जब श्याम के पास एक बंगला, एक वाहन हो ,साथ ही श्याम ने किसी अच्छे महाविद्यालय से अर्थ- ब्यबस्था की पढ़ाई कर ली हो, रहा मुरली का सवाल तो वो छोटे बच्चो को दंड देने के काम आ ही जायगी
सच यह है, की मुरली का अस्तित्व तो खो गया है पर साथ ही साथ प्रेम भी चला गया ,जो जीवन का लक्ष्य होना चाहिए और यह बात गौर करने की है की हमने युवा मे जो पैसे की भूख भर दी है बह कभी ख़तम नही होने वाली और युवा को मानवीय संवेदनाओ से दूर करती जा रही है