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Sunday, 14 November 2010

कहना सुनना या जानना नहीं, जी लेना है इसे

गम कहूँ या हँसी ,लगता है कि झोंका है
कहता हूँ तो तन्हाई, देखता हूँ तो मौका है.

कहता है वफ़ा जिसको,लगता है कि धोखा है 
तू है कहाँ खुद का ,फिर किसका भरोसा है.

माना जिसे हकीकत,वस शब्दों का घेरा है 
अँधेरा है कहा जिसको, नामौजूद सबेरा है

जी रहा है जिसको, जो जीवन सा दिखता है 
सोचा है वो किसी का,जो बाज़ार में बिकता है.

पल पल है सँवारा, जिसे सभाल कर रखता है
 ये जो रेत का घरोंदा,बनता है; के मिटता है.

माना इसे तो चाँदी,माना तो ये सोना है
ये उधार कि आँखे,और खुद में ही रोना है .

उड़ सके जो फलक तक,पिंजरे में वो मैना है
कुछ डरे डरे से पर है , और सूखे से नैना है.

इस हाथ कि खुशी जो, उस हाथ का ही गम है    
है कलम तक लिखावट , और आँख तो दर्शन है .