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Saturday, 9 April 2011

"शब्द और सत्य"

                                 शब्दों का यदि कहें ,आखिर सत्य क्या है 
                                 यदि शब्द ही सत्य हैं तो प्रक्रति प्रदत्त क्या है 

                                 माना की शब्दों ने जीवन को कई नए आयाम दिए हैं 
                                 एक साथ मिलकर शब्दों ने रचनात्मक निर्माण भी किये है 

                                 सच है शब्द खुद को फैलाने का आसान सहारा हैं  
                                 कभी गुस्सैल  हैं ,कभी प्रेमी हैं तो कभी आवारा हैं 

                                समझ पता हूँ इनकी ताकत तभी तो डरता हूँ 
                                वेबस हूँ ,कुछ कहने को इन्ही  का प्रयोग करता हूँ 

                                मन की अभिव्यक्ति वेशक, शब्द की डाली पर फलती है  
                                हुआ करते थे कभी सहारा,अब दुनिया शब्दों पर चलती है

                                शब्दों के हैं सौदागर यहाँ ,शब्दों के दीवाने हैं
                                नापना चाहो किसी को अगर शब्द ही पैमाने हैं

                                शब्दों से दुखित होते हैं, हम खुशियाँ इन्ही से पाते हैं
                                अंतर्मन के सभी फसाने इन्ही से महसूस किये जाते हैं

                                शब्दों के इस जगत में कुछेक को आसानी भी है
                                कुछ बेचारे यूँही वेबस है ,बरबस ही परेशानी भी है

                                कहीं कहीं शब्दों का लक्ष्य वार्तालाप है,और कुछ भी नहीं 
                                भरमाने वाले इस जगत में अक्सर ऐसा होता तो नहीं 

                               प्रतिशत वहुत कम है, मगर "मौन" भी जीवित है कहीं 
                               हरेक को शब्द पर तौलने की कोशिश करना भी नहीं 

                               शब्दों से बाँधकर तुमने जाने कितने अनुमान गढ़े होंगे
                               हो सकता है कुछेक तौल पर ठीक-ठाक भी चढ़े होंगे

                               हर एक गहराई को फिर भी एक मत समझ बैठना
                               कभी कभी निगाहों से भी मुश्किल होता है देखना

                              अनुमानों कि विनाह पर कुछ कम ही अकड़ना
                              जीवन इतना तरल है, की आसाँ नहीं है पकड़ना

                              वैसे तो दुनियाँ सरल है, शब्दों ने जटिल किया है
                              सीधा सा भी अगर सच है उसको भी घुमा दिया है

                              कुसूर नहीं ये तुम्हारा, सब ज़माने कि गलती है 
                              हुआ करते थे सहारा, अब दुनियाँ शब्दों पर चलती है 

                              कभी कभी अस्तित्व पर इतना प्यार होता है
                              करैं कुछ भी, कहें कुछ भी, सब बेकार होता है

                              माफ़ करैं हमें,यदि आपके दिल,हमारे शब्दों में ठनी है
                              कोशिश करना दूर हो सके,यदि कहीं ग़लतफ़हमी बनी है 

                              शब्दों के प्रभाव को देखकर, अब खुद को सिकोड़ना चाहूँगा
                              पानी हूँ,बहना तो नहीं छोड़ सकता,हाँ रूख़ जरुर मोड़ना चाहूँगा    

Sunday, 14 November 2010

कहना सुनना या जानना नहीं, जी लेना है इसे

गम कहूँ या हँसी ,लगता है कि झोंका है
कहता हूँ तो तन्हाई, देखता हूँ तो मौका है.

कहता है वफ़ा जिसको,लगता है कि धोखा है 
तू है कहाँ खुद का ,फिर किसका भरोसा है.

माना जिसे हकीकत,वस शब्दों का घेरा है 
अँधेरा है कहा जिसको, नामौजूद सबेरा है

जी रहा है जिसको, जो जीवन सा दिखता है 
सोचा है वो किसी का,जो बाज़ार में बिकता है.

पल पल है सँवारा, जिसे सभाल कर रखता है
 ये जो रेत का घरोंदा,बनता है; के मिटता है.

माना इसे तो चाँदी,माना तो ये सोना है
ये उधार कि आँखे,और खुद में ही रोना है .

उड़ सके जो फलक तक,पिंजरे में वो मैना है
कुछ डरे डरे से पर है , और सूखे से नैना है.

इस हाथ कि खुशी जो, उस हाथ का ही गम है    
है कलम तक लिखावट , और आँख तो दर्शन है .
 

Tuesday, 22 September 2009

क्या कहा .... प्रेम हो गया?


बनने लगा था इन्सां,पर अब रहा नहीं
गर यूंही था मिटाना ,तो फिर बनाया क्यों था

खोता चला गया हूँ ,ज़माने की भीड़ में तो
गर छोडनी थी ऊँगली तो अपना बनाया क्यों था

बढ़ने की मैं अकेले ,कर ही रहा था कोशिश
सहारा यूंही था छुडाना,तो साथ आया क्यों था

भरोषा किया था इतना, की आँखे नहीं रही ये
गर चराग था बुझाना ,थो फिर जलाया क्यों था

बनने लगी है अब राहें खुद अपनी तर्ज पर ही
रास्ता यूंही था भुलाना, तो फिर दिखाया क्यों था

समझा नहीं हूँ अब तक, जुनुने-ए-इश्क को मैं
गर दूर ही था जाना ,तो पास आया क्यों था

जवां हो चली ये लपटें,चिंगारी से अब तलक तो
आशियाँ यूंही था जलाना, तो फिर सजाया क्यों था

समझा नहीं मैं मकसद ,अब तक भी इश्क के ये
गर होश में था आना,तो फिर दीवाना क्यों था

जीवन के कई पड़ाव है ,कई रंग है. हर एक को समझना, और उन्हें जीना ही हमारा मकसद है, अगर आप चाहते है की जीवन को जी सकें, तो जरुरी है आप के पास प्रेम का सहारा होना चाहिए ,अन्यथा जीवन काटने से ज्यादा कुछ नहीं.
वैसे तो प्रेम एक ही संवेदना है ,पर अनुभव न कर पाने की बजह से खासकर भारत जैसे देश में इसके इतने प्रकार बताये जाते है की गिन पाना मुश्किल है . मगर जब कोई एक खास पड़ाव पर आता है तो वह इस दोराहे पर भ्रमित हो जाता है की जन्मजात संवेदना जिसे प्यार कहते है क्या संबधों के दायरे से बाहर नहीं हो सकती ,क्या कोई और जो उसका कोई नहीं लगता उससे भी प्यार हो सकता है, अब चूँकि प्रेम तो हो ही जाता है ,तो व्यक्ति बड़ी आपाधापी में फंस जाता है क्या करुँ या क्या ना करुँ, और फिर वो समाज के एकतरफा व्यबहार के चलते अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि 'प्रेम' को अपनी गलती समझकर बैठ जाता है.
फिर क्या कई सबाल उठ खड़े होते है, जो की कविता के माध्यम से बताने का प्रयास किया है, हलाँकि अगर खोज को जरी रखा जाये तो जबाब भी मिल जाते है,जो अब अगली पोस्ट का विषय होंगे ।

Wednesday, 16 September 2009

जीवन जीना है तो शराब-ऐ-हँसी पीना है

आज जब हम बहुत व्यस्त है ,तो रोजाना की दौड़-धूप में जीवन को जीना ही भूल जाते है. चेहरों की हंसी अजनबी हो जाती है तो इसी रोज की दौड़-धूप से ही कुछ हंसी के पलों को चुराने की कोशिश है,कुछ इस तरह --

एक बस पकड़ रहा है,और एक सर क्योकि स्कूटर पंचर हो गया है और अब दफ्तर जाने में देर हो रही है; रिक्शे का पहिया टेढा हो गया है,बच्चे ज्यदा भर ,लिए अब उन्हें स्कूल जाने में देर हो रही है

यहाँ मैडम के बाल धुल रहे है उधर महाशय भूखे मर रहे है, महाशय को कोर्ट जाना है और मैडम को बुटीक दोनों को देर हो रही है , एक महिला देखो नोट झटक रही है तो दूसरी की नौकरी अधर में लटक रही है,जल्दी करो भाई कहीं देर न हो जाये

भाई साहब रात भर से जग रहे है,एक बेचारे बेवजह ही भग रहे है;अब क्या करें गार्ड की नौकरी और नाईट शिफ्ट ;दूसरे की ट्रेन छूट रही है मगर बाथरूम का पाइप चोक हो गया है तो कम से कम कमरे के चक्कर तो लगाये ही जा सकते है

एक का पेंट जाली हो गया तो दूसरे का खोपडा खाली हो गया ,बहुत दिनों से कपडे बनबाने का ध्यान ही नहीं रहा पीछे से पेंट छन गया,दूसरे की सुबह सुबह पोहेबाले से बहस हो गयी ,अरे अगर पैसे ले रहा है तो कम से कम प्याज़ तो डाल दिया कर

घर में जाले लटक रहे है,भैया जी चड्डे में मटक रहे है ओफ्फो यह बैंक एक्जीक्यूटिव की नौकरी सुबह से मुह मत धो ,भाई साहब को फ़ोन आ गया पहले प्लान समझाना पड़ेगा

बच्चो को स्कूल की भड-भडी है ,मैडम को पेट की पड़ी है ,सर्दी का ये समय आँखे खुली नहीं ठीक से और स्कूल-बस हार्न दे रही है ,वहां मैडम को बदहजमी हो गयी और तो और हेड-ऑफिस में कोई और घुसा है अब ये देर तो कीमती साबित हो सकती है

बस बाले का पट्रोल जल रहा है ड्राईवर खेनी मल रहा है भाई साहब के बच्चे पता नही क्या पट्रोल के दाम आसमान छु रहे है अबे खेनी तो कभी भी ठूंस सकता है

यहाँ मरने-मारने की सम्भावना बढ़ी है तुझे पीने की पड़ी है ,आपस में ठेकेदार लड़ रहे है की दारू कोंन बेचेगा,और नौजवान बिना पिए रह नहीं सकता "अरे पहले बाटली तो दे दो फिर लड़ लेना "

एक की जेब खाली हो गयी ,दूसरे की देखते ही हालत माली हो गयी ,अरे गुरु अब तो पैसा दे दो तीन साल हो गए आज तो जेब में इतना भी नहीं की सिगरेट पी लूं ,जबाब में " अरे भैया यहाँ तो जहर खाने के भी पैसे नहीं है " तीन साल से बस हवा खाके ही तो जिन्दा था वेचारा

इधर बिना धुले कपडे लटक गए वहां साहब रास्ता भटक गए , मैडम का सहेलियों में गप्पें हांकने का समय हो गया था तो बस कपडे खगाल-खगाल कर लटका दिए सूखने के लिए,वहां साहब को सब्र न था की ट्रेन कब तक जायगी कब फाटक खुलेंगे तो साहब पटरी पकडे-पकडे जाने कहाँ निकल गए सोचा था कहीं से कट लेंगे और जल्दी से जल्दी दुकान खोल लेंगे

पुलिस ने निर्दोष को धर दबोंचा ,मंत्री भिखारी के घर पहुंचा, अगर तीन दिनों के अंदर -अंदर लुटेरों का पता नहीं लगता तो पुलिस की नौकरी जा सकती है,चलो एक निर्दोष को ही बंद कर दिया ,कुछ नहीं से तो कुछ भला ;उधर आज मत्री साहब वोट मांगते-मांगते भिखारी के घर भी जा पहुंचे ,अब जरा आप ही बताइए भिखारी कौन.

Thursday, 10 September 2009

वो बोलता था सच

अब तक बुद्ध के बारे मे जो कुछ भी जाना है, यों समझिये राइ से ज्यादा कुछ भी नहीं पर जितना जाना है,उससे अनुमान तो लगाया ही जा सकता है की वह क्या ब्यक्तित्व होगा जिसने एक समय के बहाव को पूरी तरह से उलट के रख दिया हो; क्या जादू होगा उसकी वाणी मे जिसने उस समय, जब मानवता को तलबार से तौला जाता था करुणा,दया के मंत्रों से दुनिया को बाँध दिया था और बिना किसी अमृतपान के ही अमर हो गया था

आज फिर जब हम बुद्ध के उपदेशों को समसामयिक समाज से तौलते है तो यह समाज बौना नजर आता है

यह बात गौर करने की है की अगर जीवन को बचा कर रखना है तो फिर एक बुद्ध का होना जरुरी है ,अन्यथा यह दुनिया गूंगी और बहरी होकर हिंसा की आग मे जलने तैयार हो चुकी है

बुद्ध को याद करते हुए कुछ पंक्तियाँ बन बैठी थी,जो सुनाने जा रहा हूँ

वो बोलता था सच, क्या कुछ न मिल गया होगा
पानी का था बुलबुला ,पानी मे घुल गया होगा
दुनिया तो बढ़ चली थी, दुनिया को ख़त्म करने
जीवन की उस सुई से, जीवन को सिल गया होगा
क्या कुछ न मिल गया होगा

भावनाओं की नदी के , सूखे हुआ किनारे
सूखे पड़े थे चक्षु, सूखे थे होंठ सारे
आँखों की दी नमी और होंठों को फिर सहारे
सद्भावना का दीपक, करुणा से जल गया होगा
क्या कुछ न मिल गया होगा
साँसे तो चल रही थी, पर था कहाँ पे जीवन
गा तो सभी रहे थे ,पर थी कहाँ वो सरगम
बिगुल की लय क्षमा से, दया का राग गया
आजाद सा परिंदा , पिंज़रे से उड़ गया होगा
क्या कुछ न मिल गया होगा
धर्मों मे जल रही थी, जीवन की दिव्यता भी
लम्हों मे बिक रही थी,निस्वार्थ आत्मीयता भी
आते ही उसके जैसे ,उमडा हो जैसे यौवन
संवेदना का युवा पुष्प, महाबोधि पे खिल गया होगा
क्या कुछ न मिल गया होगा