Thursday 22 October 2009

बस हम इंसान ही तो हैं ............

कभी तो सोच मानव ,क्यों लिया धरती पे तूने ये जनम ,
कभी तो याद करले ,प्रेम करना है तेरा पहला कदम ।


कभी तो देख चलके बेधड़क सच्चाई के उस रस्ते ,
कभी तो देख बनके तू बना इंसान जिसके बास्तें ।


क्यों भर रहा है दम, जो तू चल पढ़ा गँवांने को ,
होता रहा है दूर जिसको आया था तू पाने को ।


क्या कर सका है ,न्याय जिसे अपने लिए है मांगता,
क्या देखे रुक के फूल, चला आया है जिनको लांघता


क्या यही है तेरी खोज ,ये सरहद , ये रक्तरंजित सरजमीं
या समझ लिया है बोझ ,चैन की तलाश थी तुझको कही।


बन तो गया दरबान , मौत का कर सकेगा सामना ,
क्या मरते को जीवन दे सकी,पुरुषत्व की अवधारणा ।


क्या है तुझे ये इल्म , तेरे झूठ ने तुझको ही झूठा कर दिया,
जीतने की चाह ने छोटे कद के इस जहां को और छोटा कर दिया।


क्या हो गया हासिल ,जो सुन ली पत्थरों की दास्तान ,
न हिन्दू आया, न मुस्लिम पैदा हुआ, ये मेरी बात मान ।


अहसास करके देख ले ,कभी औरों के भी दर्द को ,
ऐसा न हो मर जाये व्यर्थ , न समझे जिंदगी के अर्थ को।


तू देख करके गौर, एक ही माटी के पुतले है सभी,
धर्मान्धता हटा, इंसान बनने की कोशिश कर कभी .

Tuesday 13 October 2009

दिवाली या सिर्फ सजी हुई इमारतें .....

अध्यात्मिकता का सम्बन्ध स्वतंत्रता से है और जब व्यक्ति पूर्ण रूप से स्वतंत्र होता है तो उसे खुश होने के लिए त्यौहार की जरुररत नहीं होती,हमारे देश में व्यक्तिगत जीवन को सामाजिक दायरे में इस तरह से बाँधा गया है ,की वह परतंत्रता को ही अपना जीवन लक्ष्य समझता रहे. और इस सामाजिक जीवन में थोड़े सा मनोरंजन लाने के लिए त्योहारों को स्थान दिया गया है तो क्या हम त्योहारों के माद्यम से वाकई ख़ुशी महसूस करते है या सिर्फ ये आ रहे ढर्रे का अंश मात्र है

खुशहाली आज फिर से भरमाने को है ,
दिवाली आज फिर से आने को है।
दिलों में रक्खा क्या ,दीवारें साफ़ है ,
फिर क्या नजर दौडायिए,आप ही आप है.
धन की ये सालगिरह मानाने को है,
दिवाली फिर से आने को है।
मोह्हले के बच्चे की पत्तल अधूरी है,
थाली का क्या हो, भोग लगाना पहले जरुरी है.
शुभकामनाओं का बाजार गरमाने को है
दिवाली आज फिर से आने को है।
ज्योत का ज्योत से संगम दिखाया जायेगा,
इस बहाने रूखापन जिंदगी का छिपाया जायेगा.
अर्थ आज फिर से देवत्व पाने को है,
दिवाली आज फिर से आने को है।

कबीलों में कुछ समय फिर से मस्ती छाई है,
नफरत पसंदी इन दिलों को जिन्दादिली याद आई है
दुखित मन दिल खोल अपनापन दिखाने को है.
दिवाली आज फिर से आने को है।
दीपक क्या रात का कालापन दूर कर पायेगा,
धमाका क्या दिलों का सन्नाटा हटाने पायेगा.
सोये हुए दिलों में उत्साह समाने को है,
दिवाली आज फिर से आने को है।

सच को क्या किसी मौके की कवायत होती है,
हर दिन जीवन का सावन,हर रात दिवाली होती है
हर रोज की तरह एक आवाज उठाने को है
दिवाली है ,क्या रोज मनाने को है ।