Thursday 10 September 2009

वो बोलता था सच

अब तक बुद्ध के बारे मे जो कुछ भी जाना है, यों समझिये राइ से ज्यादा कुछ भी नहीं पर जितना जाना है,उससे अनुमान तो लगाया ही जा सकता है की वह क्या ब्यक्तित्व होगा जिसने एक समय के बहाव को पूरी तरह से उलट के रख दिया हो; क्या जादू होगा उसकी वाणी मे जिसने उस समय, जब मानवता को तलबार से तौला जाता था करुणा,दया के मंत्रों से दुनिया को बाँध दिया था और बिना किसी अमृतपान के ही अमर हो गया था

आज फिर जब हम बुद्ध के उपदेशों को समसामयिक समाज से तौलते है तो यह समाज बौना नजर आता है

यह बात गौर करने की है की अगर जीवन को बचा कर रखना है तो फिर एक बुद्ध का होना जरुरी है ,अन्यथा यह दुनिया गूंगी और बहरी होकर हिंसा की आग मे जलने तैयार हो चुकी है

बुद्ध को याद करते हुए कुछ पंक्तियाँ बन बैठी थी,जो सुनाने जा रहा हूँ

वो बोलता था सच, क्या कुछ न मिल गया होगा
पानी का था बुलबुला ,पानी मे घुल गया होगा
दुनिया तो बढ़ चली थी, दुनिया को ख़त्म करने
जीवन की उस सुई से, जीवन को सिल गया होगा
क्या कुछ न मिल गया होगा

भावनाओं की नदी के , सूखे हुआ किनारे
सूखे पड़े थे चक्षु, सूखे थे होंठ सारे
आँखों की दी नमी और होंठों को फिर सहारे
सद्भावना का दीपक, करुणा से जल गया होगा
क्या कुछ न मिल गया होगा
साँसे तो चल रही थी, पर था कहाँ पे जीवन
गा तो सभी रहे थे ,पर थी कहाँ वो सरगम
बिगुल की लय क्षमा से, दया का राग गया
आजाद सा परिंदा , पिंज़रे से उड़ गया होगा
क्या कुछ न मिल गया होगा
धर्मों मे जल रही थी, जीवन की दिव्यता भी
लम्हों मे बिक रही थी,निस्वार्थ आत्मीयता भी
आते ही उसके जैसे ,उमडा हो जैसे यौवन
संवेदना का युवा पुष्प, महाबोधि पे खिल गया होगा
क्या कुछ न मिल गया होगा

4 comments:

संजय तिवारी ’संजू’ said...

लेखनी प्रभावित करती है.

RAJNISH PARIHAR said...

बहुत ही अच्छी रचना...!आज फिर एक बुद्ध की आवश्यकता है..

रामकुमार अंकुश said...

बुद्ध इस देश के होते हुए भी हमारे लिए प्रवासी भारतीयों की तरह हैं हमने सत्य से हमेशा परहेज किया
इस लिए बुद्ध अपने होते हुए भी इस देश में पराये हैं
हमें फिर से बुद्ध की देशनाओं को अपने जीवन में उतारना पड़ेगा
अच्छे भावों की अभिव्यक्ति के लिए धन्यवाद ....

विनय ओझा 'स्नेहिल' said...

अच्छा लिखा है किंतु आज के लोग बुद्ध नही बनना चाह्ते हैं क्योकि उनकी दृष्टि में वे बुद्धू हैं। इसी लिए तो आज नानक,बुद्ध और कबीर की बात को लोग महत्व नहीं दे रहे । जिस दिन से उन्हें मह्त्व देना प्रारम्भ किया जाएगा उसी दिन से बुद्ध का अनुभव स्वयं का अनुभव बन जाएगा ।